पुस्तकालयों एवं सूचना केन्द्रों के परिप्रेक्ष्य में प्रबंध के सिद्धान्तों की संक्षेप में व्याख्या करें

पुस्तकालयों एवं सूचना केन्द्रों के परिप्रेक्ष्य में प्रबंध के सिद्धान्तों की संक्षेप में व्याख्या करें 

1. पुस्तकालय सेवा की समाज में कितनी आवश्यकता है, क्या पुस्तकालय आवश्यकता को समझता है एवं इसकी पूर्ति के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं एवं भविष्य में क्या प्रस्ताव चल रहे हैं?
2. पुस्तकालय समिति में किन लोगों को शामिल किया जाना है, जो इसके विकास में योगदान दे सके । |
3. क्या पुस्तकालय भवन पुस्तकालय सेवाएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त है? अगर नहीं तो नये भवन के लिए क्या प्रयास किए जा सकते है?
4. पुस्तकालय में किस प्रकार की पाठ्य सामग्री की आवश्यकता है? पाठकों की क्या आवश्यकता है, क्या कोई विषय विशेष पर विशेष ध्यान दिया जाना है । पाठ्य सामग्री अवाप्ति के क्या साधन हो सकते हैं। इनका व्यवस्थापन किस प्रकार होगा?
5. पुस्तकालय को कितने वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता है तथा ये किस प्रकार प्राप्त किए जा सकते हैं? इनका लेखा जोखा किस प्रकार किया जायेगा?
6. पुस्तकालय के सफल संचालन के लिए कर्मचारियों की आवश्यकता है? उनकी दक्षता योग्यता क्या होगी' क्या उनको किसी तरह के प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
7. पुस्तकालय के लिए आवश्यक नियम क्या होंगे जो कि पाठकों को पुस्तकालय सेवाओं के अधिकतम उपयोग में सहायक हो? पाठकों को पुस्तकालय प्रबंधन में किस प्रकार शामिल किया जा सकता है? ।
8. पाठकों को दी जाने वाली पाठ्य सामग्री का रिकार्ड किस तरह रखा जाना है? पुस्तक चोरी के रोकने के क्या उपाय हो सकते हैं? पुस्तकों को किस तरह संरक्षित किया जा सकता
9. पुस्तकालय में उपयोग आने वाले फर्नीचर, उपकरण संसाधन क्या होंगे जिससे कि पाठक पुस्तकालय के प्रति आकर्षित हो सके?
10. क्या पुस्तकालय अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रही है। किन व्यवस्थाओं, सुविधाओं में परिवर्तन वृद्धि, कमी वांछनीय है?
उपरोक्त निर्णय किसी भी पुस्तकालय के सफल संचालन में सहायक हो सकते हैं । इस प्रकार के निर्णय लेने में विभिन्न पहलुओं जैसे पुस्तक चयन, अवाप्ति, समिति, कर्मचारियों वित्त, भवन, नियम, फर्नीचर, वर्गीकरण एवं प्रसूचीकरण प्रणाली आदि से संबंधित हैं । जिनका विस्तृत अध्ययन हम आगामी इकाइयों में विस्तार से करेंगे । इन अध्यायों से परिचित होंगे तथा आवश्यकता पड़ने पर ठीक निर्णय लेने में सक्षम हो सकेंगे ।

6. सारांश

प्रबंध सिद्धान्तों का वर्णन पुस्तकालय एवं सूचना केन्द्रों में उपयोग पुस्तकालय को एक संस्था के रूप में मानकर किया गया है । इस इकाई में प्रबंध सिद्धान्तों की पुस्तकालयों एवं सूचना केन्द्रों के परिपेक्ष्य में विवेचना की गई है जिससे विद्यार्थी को यह जानकारी प्राप्त होगी कि किस प्रकार प्रबंध के विभिन्न सिद्धान्त पुस्तकालयों में सही रूप से लागू होते हैं । विशेषकर समन्वय को पूर्ण रूप से समझाने का प्रयास किया है जिसमें पुस्तकालय के विभिन्न अनुभागों में किस प्रकार समन्वय होता है, कि जानकारी प्रदान की गई है ।

7. अभ्यासार्थ प्रश्न 

1. पुस्तकालयों एवं सूचना केन्द्रों के परिप्रेक्ष्य में प्रबंध के सिद्धान्तों की संक्षेप में व्याख्या करें । 2. पुस्तकालय प्रशासन एवं पुस्तकालय प्रबंध में क्या अंतर है। 3. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखें
(1). नियोजन (2). निर्देशन
(3).समन्वय 8. विस्तृत अध्ययनार्थ गन्थ सूची
1. अग्रवाल, आर. सी. प्रबंध जयपुर, कॉलेज बुक हाऊस, 1996. तृतीय संस्करण ।। 2. Jain, M.K. Library Manual: A practical Approach to Management,
Delhi, Shipra, 1999 Rev. ed. 3. Krishan Kumar, Library Administration and Management, New
Delhi, Vikas, 1987. 4. Mittal, R.L., Library Administration: Theory and practice, New Delhi,
Metropolitan, 1989, 5th edition 5. Singh, Ram Shobhit, Fundamentals of Library Administration and
Management. Delhi, Prabhat Prakashan, 1990.


इकाई 3: पुस्तकालय संगठन (Library Organisation)

उद्देश्य
1. पुस्तकालय में संगठन की प्रक्रिया समझाना 2. पुस्तकालय में संगठन के महत्व को समझाना, 3. पुस्तकालय संगठन-संरचना को प्रभावित करने वाले तत्वों को समझाना, 4. पुस्तकालयों के सगठनात्मक ढांचे का विस्तार से अध्ययन करने में सहायता करना ।।
संरचना
1. विषय प्रवेश 2. संगठन प्रक्रिया के लिए आवश्यक कदम 3. संगठन का महत्व 4. संगठन संरचना 5. संगठन - संरचना को प्रभावित करने वाले घटक 6. स्वस्थ संगठन के आवश्यक बिन्दु 7. पुस्तकालयों में संगठनात्मक संरचना 8. संगठनात्मक संरचना के विभिन्न रूप 9. पुस्तकालय संगठन एवं पुस्तकालय प्रशासन में अंतर 10. सारांश 11. अभ्यासार्थ प्रश्न
12. विस्तृत अध्ययनार्थ ग्रन्थ सूची

1. विषय प्रवेश

बिखरी हुई शक्तियां मिलकर जब एक पूर्ण इकाई के रूप में कार्य करती हैं तो उसे संगठन कहते हैं | वेबस्टर शब्दकोश के अनुसार 'organism' एक ऐसी जटिल संरचना है। जिससे परम्पराश्रित मूल तत्वों का सम्पूर्ण भाग से संबंध उनकी (मूल तत्वों) सम्पूर्ण भाग में निर्धारित क्रियाओं द्वारा निर्धारित होता है । उदाहरण के लिये मानव शरीर की रचना को ही लीजिये । शरीर के विभिन्न अवयवों जैसे हाथ पैर, मुंह, नाक, और मस्तिष्क आदि की सुनिश्चित एवं स्पष्ट क्रियाएँ निर्धारित हैं । ये सभी क्रियाएं पारस्परिक रूप से एक दूसरे अवयव की क्रियाओं पर आश्रित रहती हैं । चलते समय दौड़ते हुए अथवा खाना खाते हुए सभी आवश्यक अवयव किसी क्रिया का सम्पादन करते है । इस प्रकार की कार्यप्रणाली में दो बाते विशेष रूप से ध्यान में देने योग्य हैं प्रथम तो मानव शरीर के विभिन्न अवयवों का समन्वित रूप से कार्य करना एवं द्वितीय मस्तिष्क का एक केन्द्रीय भाग के रूप में समस्त अवयवों की क्रियाओं का नियोजन, निर्देशन, संचालन तथा नियंत्रण करना है । प्रभावशाली रूप से अनुभागों अथवा व्यक्तियों के कार्यकलापों में समन्वय स्थापित करने को भी संगठन' ' के नाम से जाना जाता है ।
किसी भी कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व उसका संगठन तैयार कर लेना परम आवश्यक होता है । उदाहरण के लिए मान लीजिए कि हॉकी का मैच हो रहा है उसमें एक टीम के खिलाड़ी तो सुव्यवस्थित रूप से अपने-अपने स्थानों पर खड़े होकर खेल रहे हैं और दूसरी टीम के खिलाड़ी असंगठित अव्यवस्थित हैं वे मन चाहे स्थान पर जाकर खेलने लगते हैं ऐसी दशा में यह निश्चित है कि विजय उसी टीम की होगी जो सुव्यवस्थित रूप से खेल रही है । ठीक यही बात पुस्तकालय सेवाओं के संबंध में लागू होती है । यदि किसी पुस्तकालय की सेवाएं सुसंगठित है तो उस पुस्तकालय से पाठक वांछित लाभ अर्जित कर पायेंगे ।
एक कमजोर संगठन अच्छे पुस्तक-संग्रह एवं अध्ययन-सामग्री को मिट्टी में मिला देगा, किन्तु अच्छा संगठन जिसके पास अपेक्षाकृत कम अच्छी अध्ययन सामग्री एवं पुस्तक संग्रह है, वो अपनी सेवाओं से पाठकों को पूर्ण लाभ पहुंचा सकता है । 

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